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हमारे वेदों में विधवा स्त्री का पूर्ण सन्मान-

April 7, 2013

स्वजन और पति की मृत्यु के बाद स्त्रियों को हमेशा दुखी और शोकग्रस्त जीवन जीना चाहिए, उसको (सती प्रथा के अंतर्गत) आत्महत्या करनी चाहिए कल्पना कुछ पाखंडी लोगो ने फेलाई थी जो शायद आज भी भारत में चल रही हे. स्त्री हमेशा तुच्छ हे एसी मान्यता भी आज के खास कर दलित वर्ण और पिछड़े समाज में देखने को मिल रही हे और पति मृत्यु के बाद सदा ही स्त्री को अपमानित जीवन जीना पड़ता हे, वह सुख उपभोग की अधिकारी नहीं हे एसी मान्यता भी हे.

लेकिन हमारे सनातन वेद इस मान्यता का खंडन करते हे.

ऋग्वेद के १०वे मंडल के १८वे सूक्त में विधवा स्त्री को सुखी और आनंदित जीवन व्यतीत करने का अधिकार दिया गया हे.

मंत्र ७ और ८ उसका स्पष्ट निर्देश करता हे.

इमा नारीरविधवा: सुपत्नीराग्जनेंन सपिर्षा सं विशन्तु |
अनश्रवोनमीवा: सुरत्ना आ रोहन्तु जनायो योनिमग्रे ||७||

अर्थ- यह सधवा (सौभाग्यवती) और सुंदर नारिया, घी के अंजन से शोभायमान हो कर अपने घर में प्रवेश करे, अब आंसुओ को रोक कर, मानसिक विकारों को त्याग कर, आभूषण से सुसज्जित बन कर आदरपूर्वक घर में प्रवेश करे.

उदिर्ष्व नार्यभि जीवलोकं गतासुमेतमुप शेष एहि |
हस्तग्राभस्य दिधिषोस्तवेदं पत्युर्जनित्वमभि सं बभूथ ||८||

अर्थ- हे मृतक पत्नी, तुम्हारा पति मृत्यु को प्राप्त हुआ हे, अब उसको त्याग कर (उसका संताप त्यागकर) अपने घर-परिवार का विचार कर उठ, (यदि तुम्हारे संतान हे तो) तुम अपने पति के साथ संतानोत्पत्ति इत्यादि स्त्री-कर्तव्य का निर्वाह तुम कर चुकी हो, (इस लिए अब उसके योग्य निर्वाहन हेतु)
घर जा, (और आनंद से पति द्वारा दिए गए अपने घर संसार का निर्वाहन कर). [ऋग्वेद १०.१८. ७-८]

साथ ही वेदों ने कही न कही यह निर्देश भि दिया हे की पति की मृत्यु के बाद किसी और के साथ विवाह करना अनुचित हे. रेफरंस ऋ/१०/१८/८. 
“अब उसको त्याग कर (उसका संताप त्यागकर) अपने घर-परिवार का विचार कर उठ”

मृतक पति के बाद स्त्री को दुखी नहीं होना चाहिए और साथ ही अपमानित ना हो कर पूर्ण अधिकार के साथ आनंदित हो कर अपने (पति द्वारा दिए गए) संसार का निर्वाहन करना चाहिए. जिससे स्पष्ट हे की अन्य के साथ विवाह अनुचित हे वैसे ही जेसे अपमानित और दुखी होना अनुचित हे.

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