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April 8, 2013

मोदी के भाषण के बाद NDTV के एक पत्रकार ने एक महिला उद्द्योगपति से पूछा कि “आपको मोदी जी का भाषण कैसा लगा “
महिला ने कहा “बहुत ही अच्छा और प्रेरणादायक, और महिलाओ मे जोश भरने वाला भाषण था” 

तो अब उन पत्रकार महाशय का अगल प्रश्न था कि “क्या आपको नहीं लगता कि मोदी जी का भाषण कुछ मिसप्लेस सा था क्यो कि यहा आज सभी सम्पन्न और बड़ी उदद्योगपति महिलाए ही है , छोटे स्तर की व्यापारी महिलाए या मजदूरी करने वाली महिलाये यहा मौजूद नहीं है और मोदी जी ने जो कहा वो सब सम्पन्न महिलाओ के लिए ही था?’

तो मैं अब ऐसे हरामी पत्रकारो को कहना चाहता हूँ कि “मिसप्लेस” का मतलब क्या होता है ये तो पता है क्या ? मिसप्लेस वो था जब कोई हरामजादा पानी की जगह पेशाब को प्लेस कर रहा था, मिसप्लेस वो था जब कोई भारत माता को मधुमक्खी कह रहा था । साफ नजर आता है कि ये सारे न्यूज़ चेनल अपनी पूरी ताकत लगा कर कॉंग्रेस की छवि को सुधारने मे लगे है जैसे कि कॉंग्रेस ना हुई इनकी वेश्या माँ हो गई ।

तो मित्रो उस महिला ने एक झटके मे कहा कि “नहीं बिलकुल नहीं , मोदी का भाषण हर स्तर की महिला उद्योगपति के लिए प्रेरणादायक था और बहुत ही अच्छा था ।”

अब अपने पहले प्रश्न का बलात्कार करवाने के बाद पत्रकार महाशय ने फिर एक और नया प्रश्न कांग्रेस की भक्ति दर्शाते हुए पूछा ” कि आपको राहुल के भाषण मे और मोदी के भाषण मे किसका भाषण अच्छा लगा ?”

अब कोई इस महमूर्खाधिराज को बताए कि मोदी के भाषण अपने किए श्रेष्ठ कर्मो के धरातल पर होते है और राहुल के भाषण सिर्फ और सिर्फ एक भाषण होते है और वो भी एक याद की हुई स्क्रिप्ट के आधार पर । और मोदी के कार्यक्रम मे ये राहुल के भाषण की तुलना बीच मे कहाँ से आ गई ? इनको मोदी एवं उनके कार्यक्रम से संबन्धित ही सवाल ही पूछने चाहिए, यो जबरन जनता के मुह से राहुल या कॉंग्रेस के लिये एक शब्द भी अच्छा निकाल जाये तो ये फिर उसको बढ़ा चढ़ा कर 2-3 घंटे तक कांग्रेस के कीर्तन कर सके । लेकिन ये सब जनता को साफ समझ मे आता है । 

लेकिन जब महिला ने सिर्फ इतना कहा कि हाँ राहुल का भाषण भी अच्छा था लेकिन मोदी का भाषण बहुत प्रेरक था तो पत्रकार साहब के चेहरे पर ऐसे भाव आए जो किसी हिन्दी फिल्म मे नायिका के मुह पर तब आते है जब वो शक्ति कपूर को कहती है कि “प्लीज़ भगवान के लिए मुझे छोड़ दो” और शक्तिकपूर कहता है ” तुझे भगवान के लिए छोड़ दूंगा तो फिर मैं क्या खाऊँगा…..प्रसाद ?”
और ऐसे मे जो भाव नायिका के चेहरे पर होते है वही इन पत्रकार महाशय के चेहरे पर थे ।

हद हो गई बिक जाने की भी यारों ? ऐसी पत्रकारिता से तो अच्छा है कि “तेल की बोतल और एक बोरी का टुकड़ा” ले कर, खुल कर धन्दा ही क्यो नहीं कर लेते आज कल “गे” लोगो की भी बहुत डिमांड है ।

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